धारण कर सत् कोयल के गुण

जागा अधिवक्ता पतला सा
त्यागे तन के कीमती वस्त्र
ले हाथ छड़ी जिस ओर बढा
पीछे-पीछे पग थे सहस्त्र
अनुपम- अतुलित बल का उद्भव
आज अहिंसा में है देखा
यह भ्रम या धूल भरी आंधी
या सपना कोई अनदेखा
बैरी बोले भागो-भागो
देवत्व हमें ललकार रहा
प्रेम-फाँस के प्रबल बार से
राक्षसी वृत्ति संहार रहा
घर गया शिकारी बेबस हो
बन गया महात्मा राष्ट्रपिता
ईश्वरत्व रवि प्रखर हो गया
बद् कृत्यों की जल गई चिता
“नायक बृजेश” तुम देवपुरुष
वैचारिक दर्शनरूप सगुण
निश्चय होगी शांति, स्वयं में
धारण कर सत् कोयल के गुण
…………………………………………………….

उक्त रचना को अमात्रिक से मात्रिक करने के बाद “साहित्य पीडिया” पर प्रकाशित किया गया है
यह मेरी 2013 में प्रकाशित कृति “जागा हिंदुस्तान चाहिए” की रचना है
जो कृति के पृष्ठ संख्या 48 पर छपी है

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता
03-05-2017

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