" धर्म हमारा बड़ा लचीला " !!

मन्त्रों में , वेदों में है वो ,
पत्थर की मूरत में है वो |
ना मानो तो निराकार है ,
मानो तो घट घट में है वो |
नहीं बंदिशों में बाँधा है –
सचमुच है यह बड़ा रंगीला ||

मात-पिता हैं तीरथ जैसे ,
गुरुजनों की बात निराली |
दुखीजनों की पीड़ा समझी ,
टल जाती ग्रह दशा हमारी |
साधु-संतों ने ज्ञान दिया है –
अंतर्मन का चोगा ढीला ||

परिवर्तन स्वीकार किये हैं ,
धर्म ने अंगीकार किये हैं |
सामाजिक बदलाव के चलते ,
बदले से व्यवहार किये हैं |
कई जगह उपहास हुए हैं –
क्यों नहीं है, यह हठीला ||

सच, नई-नई बेला है आई ,
नारी जागृति की अंगड़ाई |
दर्शन की बस होड़ लगी है ,
पुरुष खड़े ले रहे जम्हाई |
न्यायालय , भारी धर्म पर –
कैसा है यह ,हंसी -ठिठौला ||

सेवा में धर्म बस हम जाने ,
कर्मों से हम गये पहचाने |
नया -पुरातन रखा सामने ,
खोते जा रहे ठौर -ठिकाने |
कातर धर्म खड़ा कोने में –
बदल रहा है पल-पल चोला ||

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