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धर्म प्रेम-प्रवाह है,आइना है,कोई तस्वीर नहीं,

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

कविता

October 3, 2017

धर्म कोई लकीरें नहीं,
स्वभाव है,
सहज है,
सतत है,
प्रवाह है,
खड़ा हुआ पानी नहीं,
बहता हुआ झरना है,
.
निजता है,
जीव का चैतन्य है,
उसका विवेक है धर्म,
हर पल,हर क्षण, सतत जागरण है धर्म,
.
लोगों ने बाँट डाला,
बाँध डाला,
जनेऊ से बाँध डाला,
खतना कर बदल डाला,
नख शिखा तक पहचान बता डाली,
.
धरा पर स्वायत्ता और स्वछंदता को
पराधीनता में जकड़ डाला,
जकड़ डाला,जकड़ डाला,
.
पशु-पक्षियों,
चाँद-सितारे,
प्रभाकर तक को नहीं छोड़ा,
नहीं छोड़ा, नहीं छोड़ा,
.

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,रेवाड़ी, हरियाणा

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Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !

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