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धरोहर

aparna thapliyal

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लघु कथा

September 26, 2017

रेशम ने बड़ी मेहनत से प्रोजेक्ट तैयार किया,कई दिनो की अथक मेहनत के फलस्वरूप बेहतरीन परिणाम निकल कर आया था, इंटरनेट का पेट खंगाल खंगाल कर जानकारियाँ एकत्रित कर कंप्यूटर पर करीने से जमा कर सेव कर दिया,अंगड़ाई ले कर थकान को शरीर से विलग किया और दादा जी की तरफ घूम कर बोली..
“देखा दादाजी आधुनिक ई-पुस्तकालय का कमाल,
आप भी कंप्यूटर पर पढ़ने की आदत डाल ही लो”
दादा जी का जवाब था कि बेटा पुस्तकों का अपना ही अस्तित्व है,इनका मेरा साथ बना रहने दो..
रेशम मुँह बना कर बोली कमरा भर रद्दी इकट्ठा कर रखीै है ,हुँह अब कौन समझाये?
तभी रमणीक पहुँच गया और उत्साह से भरी रेशम उसे अपना काम दिखाने चल पड़ी, देखना भाई मेरे इस काम के फलस्वरूप मेरी ही पदोन्नति होगी..
कि तभी कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क क्रैश हो गई….
किये कराये पर पानी फिर गया..
रेशम कोअब साइबर कैफे जा कर दोबारा सारी मशक्कत करनी पड़ेगी,बैकअप भी तो नहीं रखा..
अचानक पूरे इलाके की बत्ती भी गुल हो गई., पता चला् ग्रिड में कोई खराबी आ गई है ,कम से कम दो दिन लगेंगे बिजली चालू होने में ।
रेशम के तो जैसे ऊपर ही बिजली गिर पड़ी…
समय रहते काम पूरा होना असम्भव जान पड़ता था..
एक दिन का समय तो है पर साधन?????
हाथ से लिख सकती हूँ पर नेट के बिना मैटर…
और तभी दादा जी का प्रस्ताव आया..
मैटर का समन्दर है न अपने पास..
खोलते हैं किताबों वाला कमरा…
और दादाजी ने चुहल की-
क्या रेशम … .मेरी वाली हार्ड डिस्क मोमबत्ती में भी
काम करती है।
है न धरोहर!!!

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