कविता · Reading time: 1 minute

धरा को बचाने ढूँढे विकल्प

धरती कर रही पुकार ।
प्रदूषण मचाता हाहाकार ।।
नित्य कट रहे पेड़ हरे हरे।
जंगल भी देखो है डरे डरे ।।
बंजर भूमि आँसू बहाती ।
बदहाली की कहानी सुनाती ।।
धूल धुँआ मचाता कोहराम ।
नित नित नए रोग हुए आम ।।
बढ़ता कोलाहल कान पकाए ।
यह दुखड़ा हम किसको सुनाए ।।
बना लिए हमने पेड़ काट महल ।
अब गर्मी से उठते सब दहल ।।
आओ करते हम एक संकल्प ।
धरा बचाने का ढूँढे विकल्प ।।
सब लगाए पेड़ एक एक ।
शुरू करते काम यह नेक ।।
फिर मुस्कुराएगी हमारी धरा ।
चहुँओर होगा देखो हरा भरा ।।

।।।जेपीएल।।

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