धरती का दर्द

यह धर्म धरा है देश पुण्य आत्माओं से भरा है कोटि-कोटि अदृश्य शक्तियां हैं परम सत्ता में लीन
यहां कण-कण में भगवान रोम रोम में राम है
पत्ते पत्ते जर्रे जर्रे में उसी की सत्ता है
उसके बिना दुनिया में हिलता न पत़ता है
गीता पढ़ो या गुरुवाणी बाइबल पढ़ो या कुरान
किस्सा यही महाभारत का है
यही कहती है बाबा की रामायण
सभी ने बुराई को धिक़ारा है मानवता का मार्ग बताया है
देव और दानवों का इंसान और शैतान का झगड़ा है समय-समय पर वही सत्ता आती है मानव जाति को रहना सिखाती है
वसुंधरा पर पापाचार बढ़ गया है
मानव में असुरों सामान स्वार्थ बढ़ गया है
स्वाभिमान छोड़ अहं में पड़ गया है
वसुंधरा उजाड़ रहा है पर्यावरण बिगाड़ रहा है
वृक्ष जो साक्षात देव हैं, यह उजाड़ रहा है
धरती पापाचार से त्रस्त है, राक्षस अपने में व्यस्त है दिनोंदिन ताप बढ़ रहा है, बेमौसम पानी पड़ रहा है प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया, कई जीवो जीवो का नामोनिशान मिट गया
मानव कब तक बचेगा देखते रहिए….

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