धन

धन की खातिर आदमी, करता क्या क्या काम।
श्रम बिन धन कहुँ कब मिले, कैसे हो आराम।।

कैसे हो आराम, बड़ी है आपाधापी।
धन ने जग में यार, बनाये हैं कुछ पापी।।

कह विवेक कविराय, भला बैठूं किस आसन।
नही चैन आराम, कमाऊं कैसे मै धन।

विवेक प्रजापति ‘विवेक’

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इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन, काशीपुर (उत्तराखण्ड) में कार्यरत हूँ। छन्द बन्धन में बंधी कवितायेँ और बहर...
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