धजी के सांप

धजी के सांप तो बनते बहुत है ।
पर धजी सांप की नहीं बनती ।।
भर गए भेद कितने रिश्तों में ।
बेटे और बाप की नहीं बनती ।।
पहनते खूब बाजारू कमीजें ।
बदन पर नाप की नहीं बनती ।।
वो पैदा ही हुआ है बेसुर का ।
उससे आलाप की नहीं बनती ।।
बढ़ती जाएँगी दूरियां उनमें ।
शीत और ताप की नहीं बनती ।।
चंद दौलत पे जो अकड़ जाते ।
खुद अपने आप की नहीं बनती ।।

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