द्रौणों की फौज

द्रौणों की फौज

यहां द्रौणों की फौज हो गई।
अर्जुनों की भी मौज हो गई।।

एकलव्य को न मिला प्रवेश,
डोनेशन वाले ही बने विशेष,
शिक्षा निलाम रोज हो गई।।

घर बैठे कोई भी कोर्स करिए,
नोन अटैंडिंग के पैसे भरिए,
प्रतिभा क्यों बोझ हो गई।।

फेल नहीं करना यहां कोई,
लंबी तान के व्यवस्था सोई,
भ्रष्ट तरीकों की खोज हो गई।।

शिक्षा भी व्यापार बन गई,
धनाढ्य का अधिकार बन गई,
जेब भरने की सोच हो गई।।

सिल्ला’ भी इसकी एक इकाई,
राहत कहीं भी नजर न आई,
सारी व्यवस्था विनोद हो गई।।

-विनोद सिल्ला

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