कविता · Reading time: 1 minute

दो पहलू

छुरियाँ दोस्तों उनके दिलों पर ही चलती है
मेरी मौजूदगी महफिल में जिनको खलती है ।
बेअदबी मेरी उनको बिल्कुल बर्दाश्त नहीं
तारीफ़ कोई भी करे जुबां उनकी जलती है ।
-अजय प्रसाद
जी मिलिये हमारे पड़ोसी से,रहते हैं बगल मे
अक़सर हम मिलतें रहते है फ़ेसबुक पटल पे।
वहीं दुआ सलाम कर लेते हैं घनिष्टता के साथ
हम वक्त जाया नहीं करतें साथ-साथ टहल के
जब हर मौके के लिए है इमोजी है वहाँ मौजुद
तो क्यों फ़िर तकलीफ करें हम गले मिलके ।
-अजय प्रसाद

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