कविता · Reading time: 1 minute

दो नारी को सम्मान

नारी का सम्मान नहीं
नारी दिवस मनाते हैं
अनेकों आयोजन होते हैं
बड़े बड़े भाषण देने वाले ही
नारी का शोषण करते हैं

नारी चाहत नारी कुर्बानी
कलयुग में भी नर को पूजती
हर रूप में करती सर्वस्व न्योछावर
पर अपमान और पीड़ा ही झोली में आते
अपनों के सम्मान की खातिर
मूक बधिर बन जाती है

नारी है शक्ति..नारी प्रेम है
नारी है करूणा..नारी त्याग है
पर आज भी प्रताड़ित..आज भी कुंठित
क्या अपने फैंसले खुद कर पाती है ?

मन में घुटती..ताने सहती
नारी सहनशक्ति की मूरत है
घर न टूटे..भाव न बिखरें
अपनों की खुशियों की खातिर
खुद को ही भूल जाती है

दर्द छुपाकर सीने में..मधुर मुस्कान बिखेरती है
बच्चों के अंदर सुन्दर संस्कार उकेरती है
ये नारी है जो घर को स्वर्ग बनाती है
वो पूर्ण समर्पित हो जाती है

जिस आंचल ने पाला पोसा
पुरुष अहं ने उसको ही दागदार किया
नारी नहीं है अबला..मत करो तिरस्कार
माँ-बहन की गाली देते..कहाँ गये संस्कार

नारी सिर्फ़ शरीर नहीं है..मत समझो कमज़ोर
वो ताकत है..सृजन करती ये प्यारा सा संसार
पुरुष अहं को छोडो..मत करो गलतियां बारम्बार
करो उनका एहसास..मत करो अपमान
मत करो प्रताड़ित…दो नारी को सम्मान
तभी करो नारी पर ये लम्बे चौड़े व्याख्यान

स्वरचित: अनुजा कौशिक

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