दोहे · Reading time: 1 minute

#दोहे

धर्म-ग्रंथ अंतर जले , पाखंड हुआ दूर।
देव मनुज वो हो गया , जिसके मन रब नूर।।

दीप जला जो ओज में , गयी हवाएँ हार।
द्वार अँधेरे मिट गये , जगमग मन संसार।।

सिंधु-तृषा मिटती नहीं , वैभव करे अशांत।
संतोष जड़ित मणि मिली , क्षण-क्षण जीवन कांत।।

तिलक-त्रिपुंडी भाल पर , गले जनेऊ साज।
पंडित तब तक पर नहीं , अंतर-अंतर राज।।

मंदिर मस्ज़िद तू गया , लड़ा धर्म पर रोज।
यह तो पूजा पर नहीं , पूजा समता खोज।।

ख़ुशी स्वर्ग-सम इस धरा , रिश्ते-नाते छोर।
उड़ता तभी पतंग है , जुड़ा रहे वो डोर।।

मान लिया तो हार है , ठान लिया तो जीत।
हर संकट का हल यहाँ , होना मत भयभीत।।

#आर.एस.’प्रीतम’

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