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दोहे

पढ़कर के अखबार अब , पुरखे भी हैरान .
बढ़िया है बानर रहे , बने न हम इंसान .
हत्या लूट खसोट की , ना कीजै अब बात .
अब टॉपर के खेल में , होते भीतरघात .
अभी तलक तो कैद है , हर सीने में आग .
धधक गयी कुर्सी सहित , जल जायेगा भाग .
जिनके मत से आप हो . समझो उनकी बात .
चार दिनों की चांदनी ,फिर तो काली रात .
कठपुतली भी हँस रही , देख मनुज का हाल .
नर से नारायण बड़ा , लिखता सबका भाल .
——— सतीश मापतपुरी

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