दोहे

जिस संस्कृति की भक्ति ने दिया विश्व को ग्यान
उसी भक्ति की शक्ति से क्यों हैं हम अनजान
भरत वंश की धरा पर संस्कृति हुई गरीब
चलें छोड़कर लीक को तो क्या करें नसीब
विश्व कृष्ण को मानता गाये उनके गीत
किन्तु बने हम आज क्यों पक संस्कृति के मीत
जो शाश्वत है सत्य का ईश रूप अवतार
सब में व्यापक हो रहा वही अक करतार
भारत जैसा मिलेगा कहाँ विलक्षण देश
परदेशी हैं घूमते धर कर देशी. वेश

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