दोहे-शिक्षाप्रद

दोहे-शिक्षाप्रद
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संगत अच्छी राखिए,गुणी बनो भरपूर।
माली बेचे फूल है,ख़ुशबू हाथ हुज़ूर।।

बीती बातें भूल के,नई करो शुरुआत।
बीती काली रात तो,आए नया प्रभात।।

सोच कभी ना कीजिए,संकट आएँ लाख।
सूर्य-ग्रहण को झेलता,रहती फिर भी साख।।

हारा उठके जीतता,सुनिए प्यारे मीत।
फटके बनता दूध ज्यों,पनीर देखो रीत।।

मानव ठोकर झेल के,सुधरे सदैव यार।
सोना जलके आग में,कुंदन बनता हार।।

शिक्षा साथी साँच है,करती मंज़िल पार।
वज्र सरिस है जीतती,दानव दुख को मार।।

समय साथ चलके सदा,जीतो जीवन दाँव।
निजात मिलती धूप से,आकर नीचे छाँव।।

रहता मौसम एक ना,रहे एक ना हार।
नीचे आकर देखिए,ऊपर जाती डार।।

ज्ञान बिना तो लाज है,चाहे बनो अमीर।
दीप जले तो चाहते,बुझता करे अधीर।।

नीयत रखना साफ़ तुम,बनता जाए काम।
शबरी देखे राह तो,क्यों ना आएँ राम।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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