दोहे-मानसिकता

#दोहे#
मान खुदी को श्रेष्ठ सब,फूलें झूठी शान।
चूहा हल्दी गाँठ ज्यों,पंसारी-सा मान।।

कमियाँ गिनते और की,खुद में सत्तर छेद।
छाज बोलता ठीक है,छलनी करती भेद।।

हँसके मिलना प्यार से,मर्दों वाली बात।
देख जले जो और को,कायर-सी औक़ात।।

सदा करो तारीफ़ तुम,सच्चाई की एक।
मन भी रहता शांत है,कहलाते तुम नेक।।

कीचड़ उछाल गैर पर,सत्ता पाना आज़।
राजनीति में ठीक सब,देखो यारों नाज़।।

झूठे इतने लोग हैं,बदलें पल में यार।
ज़िंदा रहते नाज़ से,देखो आत्मा मार।।

जीवन सादा राखिए,जड़िए गुण तुम लाख।
चंदन लिपटे साँप भी,घटे नहीं फिर साख।।

चुगली करना छोड़िए,कदर घटेगी यार।
ख़ुशी एक पल होय के,जीवन भर का भार।।

रिश्ते नाते कीजिए,जीवन भर हों प्राण।
पुष्प गंध महकी रहे,मुर्झाए तब त्राण।।

साथ करो यूँ एक तुम,परछाई-सा सार।
जब तक तन हो जानिए,खाती ना ये ख़ार।।

राधेयश्याम बंगालिया”प्रीतम”
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