दोहा मुक्तक

आयी बाढ़ बहे सभी, सपने औ अरमान.
छिना खेत-गिरवी हुआ, सर्व मान-सम्मान.
बनिए ने है कर लिया, तिगुना क़र्ज़ वसूल,
गया ब्याज ही ब्याज में, गेहूं-जौ-औ धान.
@डॉ.रघुनाथ मिश्र ‘सहज
अधिवक्ता/saसाहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

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