कविता · Reading time: 1 minute

दोहरी जिन्दगी

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सच-झूठ का मुखौटा पहन खुद से अनजान।
दोहरी जिन्दगी जीने लगा है आज का इन्सान।।

युग नई, सोच नई,पुराने का हो रहा अवसान।
अपनी ही बनाई जाल में खुद फस रहा नादान।।

जख्मों से भरा सीना चेहरे पर झूठी मुस्कान।
कशमकश से भरी दोहरी जिन्दगी से परेशान।।

मन में रहे कुछ मुख से कुछ करता बखान।
दिखावे की चलन में खुद से बेखबर अनजान।।

गिरगिट सा रंग बदलता पल पल ये महान।
आयना भी देख कर खुद हो रहा है हैरान।।

मुख में राम बगल में छुरी झूठ की चादर तान।
दोहरी जिन्दगी जीते-जीते कभी थकता नहीं शैतान।।

आज तो इन्सान को ही खुद खा रहा इन्सान।
एक चेहरे पे कई चेहरे ओढ़ बनता है भगवान।।

हर एक मोड़ पर खड़ा है एक बहुरूपिया हैवान।
जानवर से भी ज्यादा खतरनाक बन गया इन्सान।।

योग्यता,सद्गुणों से आदमी की अब कहाँ पहचान।
ढ़ोग,आडंबर,दिखावे को नित मिल रहा सम्मान।।

तिरस्कृत, आहत, अपमानित, उपेक्षित हर गुणवान।
आज शिक्षा का व्यापार हो रहा, गुरू का अपमान।।

नित नये-नये स्वांग से करे साध्य सब अासान।
आज धर्म,ईमान सिर्फ़ पैसा,स्वार्थ हुआ बलवान।।

सजावट,दिखावट, मिलावट का हो रहा है मान।
असली से ज्यादा नकली बिक रहा हर सामान।।

लुट रही है सबकी खुशी,आज बिक रहा ईमान।
दर्द,घुटन,जलन,बेबस हर रिश्ते और अरमान।।

मानव प्रवृत्ति देखे अपना नहीं दूजे की फटी बनियान।
दोहरा होना जुर्म नहीं बशर्ते किसी का ना हो नुकसान।।

सच-झूठ का मुखौटा पहन खुद से अनजान।
दोहरी जिन्दगी जीने लगा आज हर इन्सान।।
????—लक्ष्मी सिंह?☺
नई दिल्ली

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