दोहन करो

मटक मटक के गया भटक
रही न रतिभर चटक,
रचे रचाये खूब संवाग,
कौन सुध जब गया अटक.
.
कहते तेरा तुझको अर्पण
मालूम नहीं विध समर्पण
देख न पाये खुदही दर्पण
बेईमान लगे भंडार भरण.

पानी पीकर पूछते लोग
के सै थारी जात ,
खावण की भृत्सना करते
पीटभर कौन सा योग 😊

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