Aug 31, 2017 · कविता
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दोमुहे चरित्र

पुरुष हो या नारी
हर एक व्यक्ति के
दोमुहे चरित्र होते है,
जो सिर्फ कभी-कभी
उजागर होते है;
यहाँ तो मुँह में
राम राम और
बगल में छुरा ,
रिश्ते-नातों का
न कोई अर्थ
न कोई सहारा;
आज का भाई
कल बन जाता कसाई,
बीवी-बच्चे-पति भी
बन जाते पराई ;
फिर क्यों न कहूँ
चिल्लाकर मैं जग से,
दोमुहे चरित्र होते है
हरेक व्यक्ति के ।

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Bikash Baruah
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मैं एक अहिंदी भाषी हिंदी नवलेखक के रूप मे साहित्य साधना की कोशिश कर रहा... View full profile
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