कविता · Reading time: 1 minute

दैत्य

बलात्कार पर केंद्रित एक कविता
दैत्य
दृग दैत्य
कलुष कृत्य
वासना वीभत्स
दुष्ट दुश्शासन
विकृत मनसा
लम्पट लालसा
भूखे भेड़िये
राह में बहेलिये
भीत बेटियाँ
खतरे की घंटियाँ
हरपल भाँपती
मन ही मन कांपती
बचती बचाती
दामन को छुपाती
खंडित मान
मन लहूलुहान
रूह की बोटियाँ
सियासत की रोटियाँ
जलती मोमबत्तियाँ
अनगिन आपत्तियाँ
फिर एक यक्ष-प्रश्न
कहाँ है कृष्ण?
द्रौपदी की लाज?
सोचें आज समाज।
संकल्प एक उठाओ।
इस दैत्य को जलाओ।

-©नवल किशोर सिंह

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