"देश के हालत"

“देश के हालत”–कविता
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मेरे ख़्याल से ऐसे बिखरा है-
मेरा देश जैसे बच्चा क़िताबें-
इधर-उधर कर दे।
क़त्ल कर क़ातिल किसी शख़्स का
ग़वाह-ए-वारदात से सज़ा-
मुख़्तसर कर दे।।

घटनाओं के मकड़ जाल में फंसा है –
हर शख्स कि पेट के वास्ते किसी –
का मर्डर कर दे।
धुंध आँखों में झोंक कच्ची कली को-
मसल दे।
पैसे का लालच दे बातों को इधर-
उधर कर दे।

नेता रख लेते हैं घोटालों को दिल में –
यह सोचकर कि मेहमान घर से-
निकाले नहीं जाते।
यह तो सब जगह मौजूद हैं –
सबको ख़बर है,हम तो खुद –
अपने आप से संभाले नहीं जाते।

कुछ ऐसी शख़्सियत का तालमेल है –
हमसे पैसे का लालच देख न्याय के –
मंच संभाले नहीं जाते।
हो जाते हैँ पैसे की आड़ में ज़िस्मों
के सौदे इस देश से धंधे-
काले नहीं जाते।
सच तो कसाई की दुकान हो गई है-
दुनिया जहाँ लोगों के होठों से ख़ून-
के प्याले नहीं जाते।।

युक्तियुक्त स्मिरण कर –
बेईमानी को पचाते हैं,
स्वार्थ का तेल भर आत्मसिद्धि-
की ज्योति जलाते हैं।
घृणा,द्वेष वैमन्षय के लायक-
ही रह गए हैं इज़्ज़त बंटाधार कर-
पानी की तरह बह गए हैं।।

क्या करेंगे नवनिर्माण इस देश का,
कोई चारा ही नहीं बचा है विशेष का।
नैतिक मूल्यों को भी ज़मीं में-
रोड़ सकते हैं।
अपनी पर उतर आएं तो देश का –
भांडा फोड़ सकते हैं।।

यह देश है और यह देश के हालात हैं,
बड़े बुरे यहाँ इंसान के ख़्यालात हैं।
काश!ऐसा तालमेल हिन्दू-
मुस्लिम सिक्ख ईसाई में हो।
देखें जब देश के हालात-वारदात-
शिनाख्त से,
तो सब धर्मों का क़दम देश की भलाई में हो।।

न टिक सकें यहाँ भ्रष्टाचार के साईक़्लोन,
गिला कर दें इतना दम बारिश की-
परछाई में हो।
क़ानून चलते रहें मर्सिटीज़ कार की तरह –
इतना पेट्रोल शख़्शियत की-
अंगड़ाई में हो।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”

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