कहानी · Reading time: 12 minutes

देवी अर चन्द्रो, साथ म्ह गोल्ला

नाम देवीदयाल। उम्र 80 से एक कम मतलब 79 साल। असली नाम या तो स्कूल के रिकार्ड में है या बच्चों के सर्टिफिकेट पर। बाकी सब तो उन्हें ‘देवू’ और ‘देवीलाल’ के नाम से ही जानते हैं। हट्टे-कट्टे इतने कि देखने वाले के पसीने आ जाएं। रंगीन खादी का कुर्ता और सफेद धोती, सिर पर मन्डासा और पैरों में नोकदार जूती। मूछों का रुआब के तो क्या कहने। सावन की मस्त फुआरों में झूमती प्रेमिका की तरह दूध पी पीकर मस्ती में लहराती रहती हैं। पक्के किसान है। किसानी को ही अपना सच्चा धर्म समझते हैं। एक पुत्र है, जो रेलवे में टीटी लगा हुआ है। सरल सौम्य स्वभाव अपने पिता की तरह ही है। नाम ‘समीर’ भी स्वभाव के अनुरूप ही है। ड्यूटी दिल्ली ही है , सो हफ्ते-दो हफ्ते में गांव का एक चक्कर लगा ही लेता है। इस बहाने मां के हाथ की रोटी मिल जाती है और पिता के उपदेश।
हां, बातों-बातों में हम ‘चन्द्रो’ को तो भूल ही गए। इस बारे में उसको पता चल गया तो मेरी क्या, आपकी भी जान काढ लेगी या ताई चन्द्रो। पूरा नाम चन्द्रकला। चन्द्र की कितनी कलाएं हैं ,इसकी तो खोजबीन हो सकती है, पर हमारी चन्द्रकला को कितनी कलाएं आती हैं, ये कोई नहीं जानता। सब वक्त पर ही ईजाद होती हैं। क्या कहा? ऐसी कौन सी तोप हैं वो। मेरे भाई, तोप नहीं पूरा गोला बारूद से भरा टैंक है। बोफोर्स से भी बड़ी मार करती है। राफेल तो अपने गोडे नीचे दबाए रखती हैं वो। घुटने भले ही कमजोर हो, पर हाथ अर जबान का निशाना पक्का है। वो कहते है ना असली स्वाद तो वक्त का ही होता है, तो किसी भले वक्त पर टकराकर देख लेना। दिन में ही सूरज और चांद एक से ना दिखे तो नाम बदल देना।
अरे! हां, नाम से याद आया। मैनें नाम तो मेरा आपको बताया ही नहीं। गोल्ला कह दिया करे मुझे। हां, सही समझे मैं वो ए गोल्ला हूं, जिसे बस स्वाद लेना है, वो चाहे कहीं मिल जाये। खास बात में दिखता नहीं हूं। अदृश्य हूं। मिलना हो तो देवीदयाल और चन्द्रो के पास आकर खोज लेना। हुक्के की चिलम में लिकड़े तोड़ता अर ताई चन्द्रो की दोधारी जबान पर बैठा मिलूंगा। यहां से बढ़िया कोई जगह मुझे तो अब तक मिल नहीं पाई है। एकाध बार बाहर गया तो फिर बुला लिया, प्रेम ही इतना है हमारा। मेरा क्या रोल रहेगा इसमें। ऐसा है भलेमानसों। मेरे बिना तो ये कहानी तुम्हें सुनाएगा कौन। वो नाटका म्ह और फिल्मां म्ह होया करे न। स्क्रिप्ट और डायलॉग। मेरा यो काम है। मेरे बिना डायरेक्टर एक्शन,रोल कैमरा बोल ही नहीं सकता।
खैर आप सब बातों को छोड़ों। आपको क्या। आप सब तो मेरी तरह बस स्वाद लेने वाले हो। वो चाहे जांड तले मिले या खाट तले। किसी का चूंडला(चोटी) पाटे या खण्डका(साफा पगड़ी)। अपनी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। लाइव कब होगा। यही पूछ रहे हो ना। थम ज्यायो। इसा लाइव होगा, थाम्म देखदे रहा जाओगे।
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लाइव का अभी माहौल नहीं बना है। वो बारात आने से पहले जो स्वागत की तैयारियां होती हैं। उसी तरह अभी तो हम स्वागत के लिए रजाई-गद्दे. शरबत, चाय-कॉफी, स्नैक्स, पान पराग के इंतजाम में लगे हुए हैं। लाइव भी कर देंगे, इससे पहले हमारे धनुर्धरों के एकाध कारनामे तो जान लो।फ्लेशबैक में ले जाऊंगा इसलिए थ्री डी वाला नीला चश्मा पहन लो। सबसे पहले अपने ताऊ देवीदयाल उर्फ देवीलाल का ही एक किस्सा सुन लो।
गांव के साथ लगते एक शहर में एक बार उनका जाना हो गया। पैदल चलने की आदत है, सो रिक्शा-ऑटो की उन्हें कोई जरूरत नहीं होती है। सड़क के किनारे-किनारे चल रहे थे।
एक दुकान के बाहर छतरी लटक रही थी। दुकानदार से यूं ही रेट पूछ लिया। रै, भई, ये छतरी कितने की दी? दुकानदार: जी, डेढ़ सौ की एक। अर दो सौ की दो। ताऊ बोल्या- छोरे, महंगी लगा रहया सै। दुकानदार बोला-तू सौ की एक ले ले। सबरे सबरे बोहणी का बख्त सै। ताऊ को अभी भी रेट ज्यादा लग रहे थे। बोले- ना भई, लेण देण वाली बात कर। 50 की एक देता हो तो बता। ताऊ ने कुर्ते की जेब से रुपये निकालने का नाटक किया। दुकानदार बोला-ताऊ रोजी की कसम,कुछ नहीं कम रहया। तू, 90 की ले ज्या। ताऊ 50 पर ही अब तक अड़ा हुआ था।
दुकानदार फिर थोड़ा पिघला। बोला- ताऊ, तू मन का सच्चा आदमी है। एक काम कर। न तेरी न मेरी। 80 रुपये में बात पक्की। ताऊ चल पड़ा तो दुकानदार ने फिर रोक लिया। 70 दे दे ताऊ, कै सब गेल जाणा सै। ताऊ पीछे हटने को बिल्कुल तैयार न था। लास्ट में दुकानदार बोला- ले ताऊ, तू भी कै याद राखेगा, पकड़ या छतरी अर काढ 50 का नोट। ताऊ इस बार खूब जोर से हंसा। दुकानदार हैरान कि हंसने वाली तो कोई बात ही नहीं हुई। फिर ताऊ हंस क्यों रहा है।
ताऊ बोला-आया कोय स्वाद। इबकै फंसया सै गाबरू। भुलग्या कै, मेरै ताई सौ की चादर चार सौ में चिपकाग्या था। अर मेरे ताई कै कहवै सै कि याद राखैगा। याद तो तू राखिए मेरे शेर कि तन्नै भी कोय इस्या टकराया था। न तो ये छतरी मुझे पहले लेनी थी और न अब। मैं तो तेरे स्वाद ल्यू था। दुगने-दुगने रेट होया करै। ये कहकर ताऊ निकल लिए। अब दुकानदार के पास अपना माथा पीटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। रोज न जाने कितने भोले लोगों को वह दुगने तिगुने दामों में चीजें बेचता था, और आज एक भोला आदमी ही उसे बिना थप्पड़ मारे जिंदगी भर सहलाने वाला दर्द दे गया।
उसने पीछे से ताऊ को आवाज लगाकर रोका। ताऊ मुड़कर फिर लौट आये। दुकानदार बोला-ताऊ, छतरी ले या न ले। चाय तो पीके जानी पड़ेगी। ताऊ हंसकर बोला-पक्का दुकानदार सै। खाली कोन्या जाण दे। कोय बात नहीं, ये सौ रुपये अर छतरी दे दे। दुकानदार बोला-ताऊ शर्मिंदा न कर। या छतरी तो 50 में मिलेगी। इसमें भी ईमानदारी के 10 रुपये बच रहे हैं। ये पकड़े कान। आगे से भी अब यही कमाई रखूंगा। कभी भी आजमा के देख लेना। गलती मिले तो तेरा डोगा और मेरा सिर। ताऊ ने चाय पी और हंस कर निकल लिए।
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तो आया कुछ स्वाद? थोड़ा आया। तो इस बार स्वाद की सौ परसेंट गारण्टी। ताऊ देवीलाल के बाद एक किस्सा अपनी ताई चन्द्रो का। हुआ यूं कि एक बार ताई को अपनी बड़ी बहन ‘बिरखा’ से बात करने की इच्छा हुई। अब खुद को तो फोन मिलाना आता नहीं। ताऊ भी किसी काम से बाहर गया हुआ था। पड़ोस के एक छोरे ने बोल मारकर बुला लिया। डायरी देकर उसमें ‘बिरखा’ का नम्बर मिलाने की कही। ताई का हुक्म टालने की हिम्मत बड़े-बड़ों में नहीं, ये तो एक बच्चा ही था। की-पेड वाला फोन था। नम्बर यूं दबा दबा के मुश्किल से मिलते थे। 21344 की जगह छोरे से 22344 मिल गया।
दूसरी तरफ से हेलो की आवाज आते ही छोरे ने फोन ताई को पकड़ा दिया। दूसरी तरफ भी आवाज लड़के की ही थी।
ताई बोली-बेटा, बिरखा नै फोन दे।
कौन बिरखा?यहां तो कोई बिरखा नहीं है। बच्चे ने जवाब दिया।
ताई: बेटा, तू रामेश्वर का छोरा होगा। मैं तेरी दादी चन्द्रो।
लड़का: मेरी तो कोई दादी है ही नहीं। मेरे तो सिर्फ दादा है।
ताई: हाय राम। जाण तै पहल्यां मनै बता तो जांदी।इबै के तेरी उम्र थी जाण की। यो राम भी भले भले लोगां का बैरी है। महीने पहले तै तो बात हुई थी मेरी। एक घण्टा क्यूंकर गया, बेरा भी नहीं पाट्या था। सब सुख दुख की बतला ली थी।
लड़का: पर मेरी दादी तो अपने गांव गई हुई है। किसने कहा कि वो मर गई। आप मरो। मेरी दादी क्यूं मरे।
छोरे के इस जवाब पर ताई का मूड बदल गया।
ताई: जाई रोई कै। या बात पहल्यां नहीं बता सकै था। ल्या किसै बड़े आदमी को फोन दे। तेरे तै माथा कोनी मारया ज्या।
लड़का: तो यहां मैं कौनसा खाली बैठा हूँ। दादा देखना कोई, दादी के नाम का फोन है।
दादा: हां जी बोलिये।
ताई: बलवान बोलता होगा। ठाडा सै कै। मैं चन्द्रो बोलूं सूं। कोनी पिछाणी कै।
दादा: चन्द्रो….। कुणसे गाम्म तैं। म्हारी याद में तो चन्द्रो नाम आज पहली बार सुना है। आपको किससे बात करनी है।
ताई: नासपीटे, भूलग्या कै। बिरखा नै लेण आया करता, जब्ब मैं तनै टिक्कड़ पाथ पाथके ((रोटी बनाकर) दिया करती। बड़ा तावला(जल्दी) भूल्या जांड बरगी नासां(नाक) आले।
दादा: ये कौन सा तरीका है बात करने का। मैं रिटायर्ड डीएसपी हूं। इज्जत से बात करिए।
ताई: तूं डीएसपी चाहे थानेदार हो।(उसे डीएसपी के पद की जानकारी नहीं, उसके लिए तो थानेदार ही बड़ा होता है) मेरे पे नहीं चलेगा रोब तेरा। छोटी साली सूं तेरी। धाउं (अच्छी तरह) तेरे कान मरोड़ दयूंगी। धापली के भाई।
दादा: देखें, आपको कोई गलतफहमी होगी। ना मैं धापली का भाई और न आपकी मां का जमाई। मेरा नाम सुखचैन सिंह है और मैं दिल्ली से बोल रहा हूँ। अब आप देखें कि आपने किसे और कहां फोन मिलाया है।
ताई: तो तूं बिरखा का बटेऊ बाली(बलवान सिंह) कोन्या। जा तेरा नाश जा। एक घण्टा हो लिया, इब बतावै सै। पहल्यां बोलदे तेरा मुहं सूखै था।
दादा: आछी लुगाई सै। गलत फोन भी खुद मिलावै, अर गाल(गाली) भी हमें ही दे। यह कहकर फोन काट दिया।
ताई: (मन ही मन में) कोय बात नहीं, बिरखा तै बात करके टाइमपास करना था, वो हो लिया। इब फेर कदे बात करूंगी।
तो ऐसी है हमारी ताई चन्द्रो। गलती भी खुद की और दोष दूसरों में निकाले। ये तो एक सैम्पल मात्र किस्सा था। ऐसे किस्सों की तो हमारे पास फुल स्टॉक है। सुनाते रहेंगे।
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ये तो दोनों के अलग अलग किस्से थे। एक ये किस्सा यदि मैनें आपको नहीं सुनाया तो मेरा नैतिक धर्म मुझसे मुख मोड़ लेगा। अच्छा सुनाऊंगा, तभी तो मुझे भी याद करोगे।
हुआ यूं, एक दिन सुबह-सुबह ताऊ और ताई आंगन में बैठे चाय का रसास्वादन कर रहे थे। इसी दौरान किसी बात पर उनकी बहस चल रही थी। माहौल पूरा गर्म था। इसी दौरान एक कबाड़ी वाला घर के आगे से निकला। रद्दी,अखबार, लोहा लक्कड़, पुराना सामान। कबाड़ी वाला आ गया है आपके घरद्वार।
कबाड़ी: ताऊ कुछ देना है क्या?
ताऊ: (हंसकर) भागवान! किम्मे सै कै। देण का।
ताई: मन्नै दे दे। मैं सूं आड़े सब बड़ा कबाड़। कै भाव ले सै रे छोरे।
कबाड़ी: ठोस 17 रपिये किलो और पतरा 10।
ताई: आई जिब ठोस ए थी, इस कर्मजले गेल इस्या साथ बन्दया ठोस का जमा पतरा बन लिया। लिया तेरे कांडा-बाट। आज तै तूल ए जाऊंगी। फेर खा लेगा यो मांडे। बोरी में ले ज्यागा या कोय बोरा ल्याऊं। कबाड़ी हैरान कि ताई कहने क्या लग रही है। उसने वहां से निकलने में ही भलाई समझी।
बोला- ताई, मानस कद तै कबाड़ के भाव तुलण लागे। मेरा कोन्या इतना बड़ा ब्यौन्त। क्यूं मेरा टाइम खराब करने लगे हो।
ताऊ: ना भई, ले ज्या इसनै। एक काम करिए आठ रपिये किलो दे दे। एक क्विंटल तै ऊपर है। तोलन की भी जरूरत कोनी।
ताई: तू तो चाहवै या सै।।आजाद सांड हो ज्यागा, मेरे जाए पाछै। इब तो पक्का के तुलूंगी, अर यो गाम्म भी आज देख लेगा कि घर की लक्ष्मी ताखड़ी(तराजू) म्ह न्यू तुल्या करै।
ताऊ: देख मरीबटी, चालदे चालदे भी गाम्म कट्ठा करैगी।
ताई: जिब मन्नै ल्याया था, जिब भी गाम्म लेग्या था। इब उस गाम्म नै भी तो बेरा पाटे।
कबाड़ी: भले मानसों यों भी कोई लड़ता है। थाम्म लड़ते रहो, पर मेरा पीछा छोड़ो।
ताऊ: म्हारा मामला सुलटे बिना मराशेर (मेरे बेटे) तेरा जाणा तो अब होण तै रहया। चुपचाप बैठ ज्या, ना तै यो डोगा दीखै सै ना।
ताई: इस छोरे नै क्यों धमकावै सै। ना डरिये बेटा। इस्ते मैं सलट लयूंगी। जा इब तो पतरा कोन्या ठोस लोहा ए तुलेगा। छोरे यो बूढ़ा जमा निगर पड़या सै। इसनै तू बिना तोले ए ले ज्या।
ताऊ: इसै जीवण तै तो ताखड़ी म्ह तुलना आच्छया। फेर ला लिए लिपस्टिक। इब तो रहणा ए कोनी।
कबाड़ी: सुन ल्यो झकोई, कबाड़ी जरूर हूं। पर काम की चीज खरीदा करता हूं। काम के तुम दोनों दिख नहीं रहे। टिक्कड़ पाडन खातर मन्नै कोनी खरीदने। कबाड़ी कर बिना काम वाले कहने पर दोनों एक साथ उस पर टूट पड़े।
ताऊ: तू कुण सै यो डिसाइड करण आला। सुण ले, आपै भले बिक ज्यावां। बाकी किसै की औकात नहीं सै हामनै खरीद ले।
ताई कहां पीछे रहने वाली थी। पांच सात गालियां तो बिना कुछ कहे सरका दी। मूसल उठाकर बोली-घणा ना बोलिये। तेरा चाम(चमड़ा) सा तार दयूंगी। घर आलां कै पिछाण म्ह भी कोनी आवैगा।
दोनों के विकराल रूप को देखकर कबाड़ी पसीना-पसीना हो गया। वह गलत क्या सही क्या की ऊहापोह की स्थिति में था। माथा पकड़कर इस तरह बैठ गया जैसे बस बेहोशी आने वाली हो। ताऊ ने उसे सम्भाला और खाट पर लेटा दिया। ताई जल्दी से नींबू पानी ले आई। पानी पीकर वह थोड़ा बोलने की स्थिति में हुआ। ताई बोल पड़ी- कै होया बेटा। घबराग्या। आडै तो रोज का यो काम सै। रोटी बनी पड़ी सै, खाके जाइये। ताऊ को बोली-देखै कै सै, छोरे नै पंखे की हवा आण दे। सारी गली म्ह कब्जा करी बैठ्या। ताऊ हंसकर साइड में हो लिया। कबाड़ी ने अपना झोला उठाया और यह सोचते-सोचते चल दिया कि अजीब बन्दे हैं कबाड़ की पूछने पर इतनी महाभारत रच दी। यहां जान पर बन आई और ये फिर उसी रूप में आ गए। भविष्य में वह कबाड़ी तो क्या किसी और के वहां से निकलने के चांस कम ही रहे।
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तो भाइयों और बहनों! आपने हमारे ताऊ और ताई के किस्से सुने। मजा पक्का आया होगा। न भी आया हो तो अभी मैं तो बाकी हूं। मेरे बिना बात पूरी हो ही नही सकती। नाम तो आप सब मेरा जान ही गए होंगे। फिर भी रिपीट के देता हूं। ‘गोल्ला’ नाम है मेरा। सबको लपेटना काम है मेरा। मेरे बिना यहां सबकुछ उसी प्रकार अधूरा है, जैसे लक्ष्मण बिना सीता और राम। कुछ ज्यादा बड़ाई कर ली हो तो नाराज मत होना। अब जैसा हूं, वैसा दिखना और दिखाना भी तो जरूरी है। चलिए एक किस्सा मेरे नाम का भी सुन लीजिए।
तो हुआ यूं, एक दिन ताऊ और ताई को एक साथ बाहर जाना पड़ा। ताई की भतीजी का ब्याह था सो जाने का प्रोग्राम तो कैंसल करने की किसी की हिम्मत नहीं थी। समस्या बस यह थी कि दो दिन पशुओं को चारा कौन ख़िलावैगा और दूध कौन निकालेगा। विश्वास का आदमी बस मैं अकेला। मेरे साथ ये प्रॉब्लम कि मैं होते हुए भी नहीं था। अदृश्य तो अदृश्य ही रहता है ना।
ताऊ: चिंता ना कर बावली गोल्ला सब सम्भाल लेगा।
ताई: चिंता तो या ए सै। गोल्ला सब सम्भाल तो लेग्गा। पर उसनै कोण संभालेगा। खाट मुद्दी(उलटी) मारता देर नहीं लगावेगा।
ताऊ: रामफल नै कह चाल्ला। गोल्ला उसनै कुछ नहीं कहवेगा।
रामफल के सहारे मुझे और पशुओं को छोड़कर वो चले गए। पर अपण क्या टिकने वालों में थे। रामफल जब दूध निकालने आया तो भैंस के चुटकी भर ली। भैंस ने लात मारी तो रामफल नीचे और बाल्टी उसके सिर में। रामफल समझ गया कि सारा खेल मेरा ही है। उसने कहा- यो सारा दूध तेरा सै। काढ़न दे या न दे।
मैंने फिर उसे कुछ नहीं कहा। वो दूध निकालकर चला गया। अगली रात को दो चोर पीछे से घर में घुस गए। उन्हें मेरा पता नहीं था। भैंसों को खोलने ही वाले थे कि मेरा ध्यान पड़ गया। वो मुझे दिख रहे थे पर मैं उन्हें थोड़े ही दिख रहा था। आगे वाले चोर की टांग में टांग अड़ाई तो वह गिर पड़ा। रही सही कसर भैंस ने अपने नुकीले खुरों से उसका पैर कुचलकर पूरी कर दी। अब बारी दूसरे की थी। वो पहले वाले को बोला- देख कर नहीं चल सकता था। अब खड़ा हो ले। तूं अब पीछे आ। आगे मैं देखता हूँ। इस बार भैंस की सांकल उसने पकड़ ली। मैंने फिर खेल दिखा दिया। इस बार गोबर उछालकर उसके मुंह पर दे मारा। सारा मुंह गोबर से लथपथ। उसे लगा कि पीछे वाले ने ऐसा किया है। उसने उसे फिर डांटा। पहले वाले के मामला अभी भी समझ से बाहर था। मुंह पोंछ कर उसने फिर आगे बढ़ने का प्रयास किया। इसी बीच मैंने फिर नया खेल रच दिया। जैसे ही चलने लगा मैंने वही पड़ा फावड़ा उसकी टांगों में इस तरह फंसा दिया कि वह चारों खाने चित हो गया। यही हाल पहले वाले का भी कर दिया। दोनों इस तरह की हरकत बार-बार होने पर घबरा गए। उन्हें लगा कि यहां कोई छिपा बैठा है जो उनसे गोरिल्ला युद्ध ज्यों लड़ रहा है। उन्होंने वहां से निकलने में ही भलाई समझी। सुबह रामफल आया तो वह समझ गया कि कोई चोर घुसा होगा पर गोल्ले के फेर में आ गया होगा। दोपहर बाद ताऊ-ताई भी लौट आये। सारी बात जान ताऊ बोला: देख्या गोल्ले का कमाल। मैं कहूं था न, गोल्ला सब सम्भाल लेगा। ताई हंसते हुए बोली-गोल्ले और उसके ताऊ कै जो फ़ंसजया,उसनै सांस थोड़े न आवैगा। ताऊ-ताई की जुबान से तारीफ सुन मेरा मन भी गदगद हो लिया।
ताऊ-ताई और गोल्ला। ये वो कहानी है, जिसका कोई समापन ही नहीं हो सकता। या तिकड़ी आगे भी और कमाल दिखाती रहेगी। फिलहाल तो इतना ही काफी। अच्छा सबको राम-राम। इसी उम्मीद के साथ कि हमारी मुलाकात जल्द होगी। नए किस्सों के साथ। नये अनुभवों के साथ।
-आपका
छोटा सा।
प्यारा सा।
गोल्ला।

लेखक: सुशील कुमार ‘नवीन’ , हिसार

Competition entry: साहित्यपीडिया कहानी प्रतियोगिता
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