Aug 6, 2016 · कविता
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देर भले ही हो जाये

देर भले ही हो जाये
अंधेर सदा नहीं रहना है
मिलकर इसे उजाड़े जड़ से
नहीं इसे अब सहना है।

अनाचार का कर विनाश अब
सदाचार अपनाना है
सब मिलकर जो खडे हों सभी
अन्याय नहीं अब सहना है।

रुकती नहीं किसी के जाने से
जिंदगी चलती रहती है
मान करें काहे का मन में
काम सेवा/परमार्थ ही आना है।

कर त्याग हम अपने स्वार्थ का
जी लें कुछ औरों के लिये
समय बदल सब जायेगा
हमने प्रयत्न जो दिल से किये।
देश समाज ही पहचान हमारी
शान इन्हीं से बनती है
जमाख़ोरी और आतंक से
साख देश की घटती है।

हम सा नहीं जहाँ में कोई
विशव के हम हैं कर्णधार
बहुत पुरानी साख हमारी
बात नहीं यह निराधार।

काँटों को फिर फूल बनाने
आते हैं जग में खुद भगवान
फिर भी हम जो धयान न देंतो
कैसे हो हम सबका कल्याण।

अमिट छाप हम जग पर छोडे
व्यवस्थित कर अपना वयवहार
सुखमय जीवन सबका हो जाये
देख रहा हमें ‘लता’ संसार।
सूक्षम लता महाजन

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Suksham Mahajan
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