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देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है||

शिवदत्त श्रोत्रिय

शिवदत्त श्रोत्रिय

कविता

October 19, 2016

हर पहर, हर घड़ी रहता है जागता
बिना रुके बिना थके रहता है भागता
कुछ नही रखना है इसे अपने पास
सागर से, नदी से, तालाबो से माँगता
दिन रात सब कुछ लूटाकर, बादल
दाग काला दामन पर सहता यहाँ है||

देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है…

हर दिन की रोशनी रात का अंधेरा
जिसकी वजह से है सुबह का सवेरा
अगर रूठ जाए चन्द लम्हो के लिए
तम का विकराल हो जाएगा बसेरा
खुद जल के देता है चाँद को रोशनी
चाँद की तारीफ से पर जलता कहाँ है||

देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है…

मुखहोटा है चेहरे पर, वो चेहरा नही है
सांसो पर उसकी भी पहरा वही है
हर एक सर्कस मे बनता है, जोकर
वो मुस्कराता है जैसे घाव गहरा नही है
हसता है वो दूसरो को हसाने की खातिर
गम उसका आँखो से बहता कहाँ है||

देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है…

Author
शिवदत्त श्रोत्रिय
हिन्दी साहित्य के प्रति रुझान, अपने विचारो की अभिव्यक्ति आप सब को समर्पित करता हूँ| ‎स्नातकोत्तर की उपाधि मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान से प्राप्त की और वर्तमान समय मे सॉफ्टवेर इंजिनियर के पद पर मल्टी नॅशनल कंपनी मे कार्यरत... Read more
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