कविता · Reading time: 1 minute

देखि दर्पण में रहीी*एक चित्र* शहीद की पत्नी

देखि दर्पण में रही, चलचित्र जीवन का महज़।
कैसे वह दुल्हन बनी,प्यार पाया था सहज।।

माँग में सिन्दूर शोभित ,भाल पे था स्वर्ण टीका।
आज जीवन हो गया है.आसवित पानी सा फीका।

भोला बचपन याद करके,माँ से वह बतिया रही ।
खून के आँसू नयन में,चिता न किंचित कर रही। ।

अजीब दास्ताँ है उसके, जीवन की सीधी सरल।
पी रही हर सांस में वह, तीखा अरु मादक गरल।।

फक्र है उसको सजन पे, जो शहीदी हो गया है।
देश की करते सुरक्षा ,सरहदों पर मिट गया है।..

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