कविता · Reading time: 1 minute

दूसरों का कंधा चाहिए

हर किसी को कंधा चाहिए
फलता फूलता लोकतंत्र चाहिए
धंधे में ना कोई पंगा चाहिए
दिल में छुपे दर्द को,
कोई गैर जुबां चाहिए ।

आदत हो गयी है
बेजुबान होने की ,अधिकार खोने की
नाक रगड़ने की,पीछे गाली देने की
गुलामी का इतिहास गढ़ने की
गले में पट्टा और मांस का टुकड़ा चाहिए ।

आँख खोलकर खड़े हैं ,
अंधे होकर , बुतों की तरह
बाहर शरीर है,अंदर भूसा भरा है
बिकने के लिए
धर्म,जाति और नारों पर
और उज्ज्वल भविष्य चाहिए ।

आज को मुर्दा कर
हंसता खेलता कल चाहिए
दुष्टता को छुपाने
आँखों में अध्यात्म चाहिए
कायर होकर आज से
कल मोक्ष चाहिए ।

ये मास्क है ,मुजीखा नहीं
खोलना मना है , बोलना नही
शरीर कम बीमार
देश ज्यादा हुआ है
देर सबेर ही सही
भगत सिंह का इंकलाब चाहिए ।

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Working as Govt. Pharmacist In Delhi. मैं कुछ नही, सिवाय चलती-रूकती आत्मा के । इस जन्म मेरा, सामाजिक लिवास सोलंकी प्रशांत है ।। ना नाम हुआ, ना बदनाम हुआ ।…
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