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दूसरा पहलू

Shubha Mehta

Shubha Mehta

कविता

September 11, 2016

देखा पलट के
पीछे की ओर
था नज़ारा वहाँ कुछ और
होठों पे थी मुस्कान
जैसे ओढ़ी हुई
उस के पीछे
छुपा दर्द भी
देखा था मैनें
हक़ीक़त यही थी
न हँसना ,न रोना
न प्यार ,न उसका अहसास
कहने को तो सभी थे अपने
फिर भी पाया अकेला स्वयं को
सब कुछ था फिर भी
दिल का एक कोना था उदास ।

Author
Shubha Mehta
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