दूरियां

दूरियां

दूरियां प्यार को कभी ख़त्म नहीं कर सकती….बल्कि बढ़ा देती हैं एक-दूसरे की महत्ता को….

कभी नदी किनारे नर्म ठंडी रेत पर बैठकर डूबते हुए सूरज को निहारता हूँ….
कभी किसी मन्दिर की सीढ़ियां पैदल चढ़कर जाता हूँ….
और दर्शनोपरांत
उन्हीं सीढ़ियों पर कुछ देर बैठकर वादियों की खूबसूरती को आंखों से पी जाता हूँ….
मगर इन सबके बीच
जब तन्हाई आकर डस जाती है….
तो कुछ दर्द के साए उमड़ने लगते हैं
जो
ख़्वाबों-ख्यालों का ताना-बाना
कुछ इस तरह बुनते हैं
जो तुम्हारी याद दिलता है….
फ़ोन में रखी कुछ तस्वीरों को निहारता
हूँ और थक कर तुम्हारी यादों के साए में
सो जाता हूँ….

सुनील पुष्करणा

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