दुश्मन को कभी मित्र न मानो -रस्तोगी

मिली कहीं तुलसी की माला
लेकर उसे गले में डाला
तन में अपने राख लगाई
बैरागी सा रूप बनाया |

माथे पर टीका लगाया
चंदन से उसको सजाया
जैसे बनी हो राम की भक्त
ऐसा उसने सबको दर्शाया |

बिल्ली चली प्रयाग नहाने
चूहों से बोली ऐ प्यारो !
मैंने किये हजारो पाप
तुमको दिए कितने संताप |

कर उन सब पापो का ख्याल
मैंने छोड़ा अब जग जंजाल
अब जाती हूँ तीर्थ करने
राम राम रट रट कर मरने |

चूहों ने न किया सोच विचार
सत्तू बांध हुए सब तैयार
ज्यो ही पहुची बिल्ली पुल के पास
करने लगी उनका अब नास |

लगने लगी दौड़ाने उनको
ले ले खूब चबाने उनको
दुश्मन को कभी मित्र न मानो
उसका कहा कभी मत मानो |

आर के रस्तोगी

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