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दुमदार दोहे

Rajendra jain

Rajendra jain

दोहे

January 30, 2017

आज देखिए हमारे कुछ दुमदार दोहे…

दुमदार दोहे…


लोकतंत्र जब देश मे,
भीड़तंत्र बन जाय।
सही गलत की सोच तब,
भीड़ में ही खो जाय।।
.. दुम
पिसे जनता बेचारी।
भीड़ मे ताकत भारी।।

स्वार्थ भाव जब पनपता,
पनपे भ्रष्टाचार।
करे खोखला देश को
कोशिश सब बेकार।।
दुम
आपसी जो इकरारी।
स्वार्थी सत्ताधारी।।

महगाई की मार से,
कमर टूट गई आज।
रिश्वतखोरी हर कदम,
पूरा दुखी समाज।।
दुम
कुछ भी न होय कमाई।
पास की पुँजी गमाई।।

बत्तीस रुपये रोजी,
बनी गरीबी रेख।
सरकारी यह आंकड़ा,
हे!ईश्वर अब देख।।
दुम
नियत कैसी सरकारी।
सुनो तुम टेर हमारी।।

दप्तर मे लगी कतार,
आज काम न होय।
कल बाबू जी बीमार,
कतार दोगुनि होय।।
दुम
करुँ क्या मै महतारी।
खेल मे उनकी पारी।।

रिश्वत औषधि दीजिये,
बाबू जी तब टंच।
काम बनेगा आपका,
करें उन्हीं संग लंच।।
. दुम
लंच मे शक्ति भारी।
इसी से दुनिया हारी।।

भ्रष्टाचारी देश के,
माथे लगा कलंक।
जनता का हक छीनकर,
करे देश को रंक।।
दुम
दुष्ट वो अत्याचारी।
लगी उसको बीमारी।।

अपनी चादर नापकर,
लीजे पैर पसार।
पाप कमाई न करें,
चाहे कष्ट हजार।।
दुम
नही तो फिर अँधियारी।
घूमले दुनियाँ सारी।।

राजेन्द्र’अनेकांत’
बालाघाट दि.३०-०१-१७

Author
Rajendra jain
प्रकृति, पर्यावरण, जीव दया, सामाजिक चेतना,खेती और कृषक की व्यथा आदि विषयों पर दोहा, कुंडलिया,चोपाई,हाईकु आदि छंद बद्ध तथा छंद मुक्त रचना धर्मिता मे किंचित सहभागिता.....
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