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दुनिया और हम

Versha Varshney

Versha Varshney

कविता

April 7, 2017

हैरान हो जाती हूँ दुनिया को देखकर ,
समझ में कुछ नहीं आता ।
भरते हैं जो हर पल दावा वफ़ा का ,
भुलाने में क्यों एक पल भी नहीं जाता ।
झरते हैं आँखों से अश्क कुछ इस तरह ,
जैसे बिन बादल की बरसात हो ।
रोते हैं छिप कर दीवारों से भी ,
जिन्हें महफ़िल में रोना नहीं आता ।
जख्म हैं या इलाही किसी चोट के
या कर्मों का जनाजा निकाला है ।
गैरों के साथ रहते हैं फक्र से ,
अपनों का दर्द सहा नहीं जाता ।
दरिया दिल होकर भी हाथ मलते रहे ,
जाने क्यों मरहम भी फ्री नहीं आता ।
जश्ने इश्क़ में भुला दिया खुद को ,
कुछ इस तरह जैसे दर्द से नहीं है ,
अपना जन्मों से कोई नाता ।।

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Author
Versha Varshney
कवियित्री और लेखिका अलीगढ़ यू पी !_यही है_ जिंदगी" मेरा कविता संग्रह है ! विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन ! साझा संकलन -१.भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ ! २.पुष्पगंधा 3.संदल सुगंध Indian trailblazer women Award 2017 pride of the women... Read more

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