दुःखो की मारी औरत(कविता)

दुखो की मारी औरत/मंदीप

कवि को बेसहारा औरत मिलती है और क्या बात होती है—–

रे बेसहारा औरत तू क्यों रहो रही है,
तेरे आँसु क्यों नही रुक रहे,ऐसी क्या बात हुई है।

क्यों तेरा रूप फीका हुआ है,क्यों हो रही आँखे लाल,
एक बार बोल तू क्या है तेरे दिल में मलाल।

कुछ तो बुरा हुआ है ऐसे नही हुई आँखे तेरी लाल।
सुबक सुबक कर ऐसे नही हुआ तेरे यो का बुरा हाल।

साफ साफ दिख रहा तू किस्मत की है मरी,
क्यों हाल ऐसा तेरा हुआ लगता तू अपने आप से है हारी।

हे कविराज ….

अब दिन रात लगे एक समान,
कैसे करूँ मै मेरी कहानी का बखान।

मै बेसहारा किस्मत की मरी हूँ,
मै भगवान के हाथो हारी हूँ।

मै पूजा करती उसकी दिन रात उसने मेरे साथ क्या किया,
बरी जवानी में उस ने मेरा सब कुछ छिन लिया।

भुखी रहती अच्छा जीवन साथी पाने के लिए,
अब मिल गया तूने उस को अब मुझ से छिन लिया।

अब ना जीने की इच्छा रही मुझे भी बुला ले,
अगर तेरे मन में कुछ बाकि है तू मुझे उठा ले।

अब बिता समय मै सब बुल गई,
मेरी सारी ख़ुशी भगवान तेरे हाथो झूल गई।

सुनी मांग देख भगवान हो गई तेरे मन में शान्ति,
आज के बात मै तुम हो ये कभी नही मानती।

जाते जाते दो फूल मेरी जोली में डाल दीये,
अब बस दुआ है उन का जीवन सुदार दीये।

मंदीपसाई

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