दीवानगी (कविता)

तू देख ज़रा मेरी दीवानगी,
किस तरह सज-संवर कर आई है।
आंसुओं के फूल और,
सर्द आहों के हार लायी है।
जिंदगी से मिले कुछ दर्द ,टीस,
वेदना और ज़ख्म लायी ह।
तुझे उपहार -स्वरूप देने हेतु,
दिल रूपी मञ्जूषा से गम लायी ह।
आ तुझे मैं अपने आंसुओं से सजा दूँ।
यह अश्कों की माला मैने सिर्फ,
तुम्हारे लिए बनायीं ह।
अपने अरमानो के टुकड़े करके,
तुम्हारे लिए सेज सजाई है।
आ मेरे समीप बैठकर राज़-ऐ- दिल खोल ले।
कुछ अपनी कह तो कुछ मेरी सुन ले।
फिर तुझे फुर्सत हो न हो।
फिर यह मुलाक़ात अपनी हो न हो।
फुर्सत तो तुझे आज भी नहीं,
मगर कोई बात नहीं चाँद लम्हें,
किसी से उधर ले ले।
आज मेरी दीवानगी तुझसे बस यही,
कहने आई है।

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