कविता · Reading time: 1 minute

दीपावली

दीपावली के दीप फिर जले है
घर-आँगन के चहुँ,
लगते कितने भले है
दीपों की लंबी कतार
दूर दूर तक जलते झिलमिल
जलते जाते लगातार
झोंकों को छल,जल अविरल तिल तिल
गति ही जीवन का उदगार
जलते है पर चलते है कदम-कदम
चरैवेति का सतत प्रयास
जीवन की डगर हरदम
इन दीपों के हो आसपास
नई उजास हो,तम दूर हो
सतरंगी सपनों में सरगम का सुर हो
धन्य धान्य सम्पन्न जीवन रुचिर सफल
अधरों पे अमिट मुस्कान मधुर हो
दीवाली के ये प्रज्वलित दीये
आए यही शुभ संदेश लिए।

-©नवल किशोर सिंह

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