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दीपावली

* दीपावली *
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लक्ष्मी और गणेश के सुन्दर,
चित्र सजे हैँ घर घर मेँ ।
भाँति भाँति के मिष्ठानोँ के,
भोग बने हैँ घर घर मेँ ।

नए नए वस्त्रोँ को पहनेँ,
मस्त मस्त लगते हैँ बच्चे ।
आतिशबाजी फूलझड़ियोँ का,
पूर्ण आनन्द उठाते बच्चे ।

आँगन मेँ मोहक रंगोली,
सबके मन को भाए ।
सुन्दर अल्पनाओँ का चित्रण,
मधुर भाव दर्शाए ।

अगणित दीपों की माला,
जब हो जाती आलोकित ।
हर घर आँगन हो जाता तब,
दिव्य तेज से आच्छादित ।

दूर भगाएँ अंतर का तम,
मन से मन का दीप जलायेँ ।
द्वेश भाव मनभेद मिटे तब,
समरसता ही बढ़ती जाए ।

बुझे निराशामय जीवन मेँ,
आशा दीप जलाओ ।
केवल अश्रु खुशी मेँ छलके,
ऐसा दीप जलाओ ।
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– सुरेन्द्रपाल वैद्य, मण्डी (हिमाचल प्रदेश)

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