दीनदयाल

दीनदयाल
मदद करने से
कतराते है।

नहीं आते हैं
सुनकर पुकार
किसी दीन की।

वे हैरान हैं
चलन देखकर
परेशान हैं।

अब द्रौपदी
बदन उघराती
मुस्काती है।

हुई बिंदास
टाँगती खूँटी पर
लाज शरम।

उघड़ जाती है
नहीं है समस्या
चीर हरण।

पीती है दर्द
बनी हुई जुझारू
पीकर दारू।

अभी काम है
टाटा घनश्याम
फिर मिलेंगे।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

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