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दीदार अधुरा था

Govind Kurmi

Govind Kurmi

कविता

November 22, 2016

हूश्न के द्वार पर देखा, हूश्न जुल्फों में उलझा था!

मिला दिल को सुकूं कि, ऐसा हमने नजारा देखा था!

उसकी भीगी जुल्फों में, आंखें ठहरी दिल खोया था!

हम खोये नीली आंखों में, जब उसने हमको देखा था!

वो पलटी मूं युं बनाकर, अब उसको हमपर शक था!

हम फिदा हुये इस कारीगरी पर, यह उसको भी एहसास था!

ऐसा हुआ था पहली बार, जब हमने उससे कुछ मांगा था!

दो पल और दे ऐसे खुदा, ऐ दीदार अभी अधूरा था!

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Author
Govind Kurmi
गौर के शहर में खबर बन गया हूँ । १लड़की के प्यार में शायर बन गया हूँ ।

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