दिव्य प्रेम

आकर्षणमय प्यार कभी न रुकता, अतिशय शिथिल- दीन है |
सुविधाओं व संसर्गों से प्रकट नेह रोमांच हीन है|
प्रभु के प्रति अनुराग में, जितने निकट ,लगाव उतना उच्च|
“दिव्य प्रेम” में फीकापन न, नित जाग्रत, हर दम नवीन है |

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

Like 1 Comment 1
Views 265

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing