दिव्यांग या विकलांग

“दिव्यांग या विकलांग” इस शब्द का उच्चारण मैं आज इसलिए कर रहा हूं की पहले के सरकारी दस्तावेजों में विकलांग शब्द का उच्चारण किया जाता था और आज के सरकारी दस्तावेजों में दिव्यांग शब्द का उच्चारण किया जाता है आखिर ऐसा क्यों?

दिव्यांग और विकलांग इन दोनों शब्दों का अर्थ तो एक ही है लेकिन इन दोनों का भाव अलग – अलग है। क्योंकि जब आप विकलांग शब्द का उच्चारण करते हैं तो इससे हीन भाव का बोध होता है और जिस व्यक्ति के अंदर विकलांगता पाया जाता है तो उसे हीन भाव से लोग देखते हैं और यह समझते हैं कि यह व्यक्ति पूर्व जन्म में कुछ गलतियां किया होगा जो माफ करने लायक नहीं होगा। जिसके चलते भगवान ने इन्हें विकलांग के रूप में इस जन्म में पैदा किया है कि यह अपना पूर्व जन्मों का कुकर्म इस जन्म में भोग ले। तो कुछ लोगों का कहना होता है कि जब यह व्यक्ति गर्भावस्था में होगा उस समय सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण लगने के समय इनकी मां ध्यान नहीं दी होगी, जिसके चलते इनके ऊपर भी ग्रहण लगा हुआ है और ग्रहण का मरा हुआ व्यक्ति है।

इस विकलांग शब्द से हर व्यक्ति डरता है और वह सोचता है कि मेरे घर में ऐसा कोई व्यक्ति न हो जाए जिसके लिए विकलांग शब्द का प्रयोग करना पड़े। क्योंकि समाज में विकलांग व्यक्ति को एक कलंक के रूप में देखा जाता है।

जबकि वहीं दिव्यांग शब्द के उच्चारण से अर्थ तो वही रहता है पर भाव में बदलाव आ जाता है। क्योंकि दिव्यांग शब्द को परिभाषित करते हुए देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहें थे कि किसी व्यक्ति को भगवान के द्वारा आम व्यक्तियों से कुछ अलग हटकर अंग दिया गया हो तो वह दोष नहीं है बल्कि भगवान के दिव्य रूपों के द्वारा दिया हुआ अंग है जिसे हम लोग दिव्यांग के रूप में कहेंगे।

आप सोच रहे होंगे कि हम इस शब्द पर चर्चा क्यों कर रहे हैं तो बात यह है कि हमारे यहां आंगनबाड़ी सेविका एवं सहायिका की बहाली आम सभा के द्वारा मैट्रिक के अंक प्रमाण पत्र के आधार पर हो रहा था। जिसमें नियम यह था कि मैट्रिक के अंक प्रमाण पत्र में जिसका सबसे ज्यादा अंक होगा वही सेविका और सहायिका की पद पर नियुक्त होंगी साथ ही अगर कोई व्यक्ति दिव्यांग होगा तो उसके लिए उसको पांच अंक अलग से मिलेगा।

बस इसी बात को लेकर उस आंगनबाड़ी सेविका पद की बहाली के लिए तीन महिलाएं आवेदन की थी और तीनों महिलाओं के पास मैट्रिक के अंक प्रमाण पत्र के साथ – साथ दिव्यांग प्रमाण पत्र भी था। जबकि हकीकत में तीनों महिलाओं में से कोई भी महिला दिव्यांग नहीं थी तो फिर दिव्यांग प्रमाण पत्र की जरूरत क्यों पड़ा? दिव्यांग प्रमाण पत्र की जरूरत पड़ने का कारण यह था कि उस महिलाओं में से एक महिला का मैट्रिक के अंक प्रमाण पत्र में अंक कम था जिसको लेकर उन्होंने होशियारी की और विकलांग प्रमाण पत्र बनवाली थी। बस यह खबर उन अन्य दो महिलाओं को भी पता चल गया जिसको लेकर उन दोनों महिलाओं ने भी अपना-अपना दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवा लिया। हालांकि इन तीनों महिलाओं में से किसी का भी बहाली नहीं हो पाया और बहाली स्थगित कर दिया गया। बहाली स्थगित करते समय अगले सूचना तक इंतजार करने को कहा गया।

इस बात पर हमें हंसी भी आ रही है और अफसोस भी कि एक सेविका पद की बहाली के लिए अच्छे इंसान, अच्छे व्यक्ति अपने आप को दिव्यांग घोषित करने के लिए दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवा ले रहा है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि भगवान के दिव्य दृष्टि द्वारा दिया गया अंग जो आम व्यक्तियों से अलग पहचान दिलाता है, उसे दिव्यांग कहेंगे न की विकलांग। लेकिन आजकल इसी दिव्य रूपों का लोग दुरुपयोग करते हुए नजर आ रहे हैं और जो हकीकत में दिव्यांग हैं उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इस तरीका से इस देश में यह पहला केस नहीं है बल्कि इस देश में बहुत सारा ऐसा केस है जिसके द्वारा दिव्यांग लोगों का अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इस पर सरकार द्वारा लगाम लगाना चाहिए।

इसमें मैं सरकार की भी नाकामी मानता है कि उनके कर्मचारी ही कुछ रुपए के लालच में जाली दिव्यांग प्रमाण पत्र जारी कर दे रहे हैं।

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