दिवाली को मैंने बस यूं अकेले मनते ही देखा है

मैंने अब रिश्तो में कटुता देखी है
मन में कुंठा दिलों में उदासी देखी है
कहने को है परिवार बड़ा..
दिवाली को मैंने बस यूं अकेले मनते ही देखा है

स्वार्थ में है इंसान दुखी,मन में अहं की रेखा है
माफ़ी वो मांगे या मैं माँगू
मन में वैर पाले इंसान को मैंने देखा है
दिवाली को मैंने बस यूं अकेले मनते ही देखा है

अहं में एक दूसरे को बस नीचा दिखाते देखा है
टूट जाना मंजूर पर झुकते ना किसी को देखा है
ये “मैं” ही बस रिश्तो में लक्ष्मण रेखा है
दिवाली को मैंने बस यूं अकेले मनते ही देखा है

रिश्ता निभाने की पहल करे जो
उसे भी आंसू बहाते ही देखा है
अपनो की खुशी में खुद को जलाते ही देखा है
दिवाली को मैंने बस यूं अकेले मनते ही देखा है

माफ़ी मांग लेना और माफ़ कर देना
इक दूज़े को बस यूं ही गले से लगाना
मन में ना हो मैल..ना हो कोई झूठा फ़साना
मिलजुल कर बस सब खुशियाँ मनाना
ए दोस्त कुछ यूं तुम दिवाली मना जाना
सबके दिलों में घर कर जाना

स्वार्थ के लिये ना रिश्ते बनाना
मौका मिले तो सारथी बन जाना
दुख दूसरों के अपने बना जाना
घर के संग मन को भी अपने स्वच्छ कर जाना
कुछ इस तरह तुम दिवाली मनाना
मकसद हो बस खुशियाँ फ़ैलाना

न हो मन में कोई भी गांठ
ना ही हो कोई बदले की भावना
क्योंकि मैने अपनो को ही इस अग्नि में जलते देखा है
इस आग में अक्सर रिश्तो को मरते देखा है
आजकल दिवाली को मैंने बस यूं अकेले मनते ही देखा है
बस अकेले मनते ही देखा है
©® अनुजा कौशिक

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