कविता · Reading time: 1 minute

दिल से न खेलो किसी के

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

जिंदगी में जो न बन सको
गर कभी अपने किसी के
कम से कम रास्ते का रोड़ा
तो तुम न बनो किसी के

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

दिल खेलने की चीज़ नहीं
कभी न खेलो दिल से
आवाज़ निकल रही ये
आज तो हर टूटे दिल से

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

दिल उसका भी है नाज़ुक
वो भी अपने हैं किसी के
अरमान हज़ारों हो सकते हैं
उसके दिल में भी किसी के

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

जो खेलोगे दिल से किसी के
तुम कैसे आबाद रह पाओगे
कोई खेलेगा तुम्हारे दिल से जब
दर्द दिल का तुम जान पाओगे

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

लगता है जब दिल किसी से
सबकुछ हो जाता है वो
हम कुछ भी नहीं देखते फिर
बस अपना हो जाता है वो

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

दिल में बसाता है जब कोई
तुम्हें जीवन सौंप देता है वो
छोड़ जाओगे जो बीच राह
जीवन, कैसे जी पाएगा वो

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

जो तुम्हारे दिल से खेल गया
तुम्हारा अपना कभी कोई
भूल न पाओगे वो दर्द कभी
जो दे जाए अपना गर कोई

दिल से न खेलो किसी के
सपने ना तोड़ो किसी के।।

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