दिल से नहीं निकलता जो वो ख्याल हो तुम

दिल से नहीं निकलता जो वो ख्याल हो तुम,
उस खुदा की रचनाओं में बेमिसाल हो तुम।

तुम्हें पाने की ख्वाहिश दिल में लिए हुए हैं,
समझ ना सके वो शतरंज की चाल हो तुम।

खुदा से बढ़कर तो नहीं पर कम भी नहीं हो,
जिसमें खुद फँसना चाहें वो ही जाल हो तुम।

अंग अंग साँचे में ढ़ला ऊपर से तुम्हारा यौवन,
मदमस्त सागर की एक उफनती झाल हो तुम।

गुलाब की पंखुड़ियों सा नाजुक बदन लिए हो,
आईने से पूछ लेना रुप सौंदर्य का ताल हो तुम।

चाँद की चाँदनी का नूर भी तुम्हीं से कायम है,
उगते सूरज की लालिमा से भी लाल हो तुम।

“सुलक्षणा” चेहरे से नकाब ना हटने देना कभी,
वो खुदा जाने कितने आशिकों का काल हो तुम।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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