गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

दिल श्मशान होता जा रहा है

ये दिल नादान होता जा रहा है
खुद से अंजान होता जा रहा है

जो कल तक माँगता कुर्बानियाँ था
वो खुद कुर्बान होता जा रहा है

बिकेगा शौक से के आदमी अब
फ़क़त दूकान होता जा रहा है

जिसे घर जैसा होना चाहिए था
वही मेहमान होता जा रहा है

कई यादें हुई हैं दफ़्न दिल में
के दिल श्मशान होता जा रहा है

यहाँ पर लोग सारे अजनबी हैं
ये घर माकान होता जा रहा है

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