दिल्ली मर रहा है ।

दिल्ली मर रहा है ,
दिल्ली हांफ रहा है,
हवा में ज़हर घुल गया है।
और लोग,
आँख मूंदे चल रहें है,

उफ;
साँस भी छान- छान के ले रहें हैं लोग ।
इंडिया गेट ग़ायब है,
नहीं -नहीं चोरी नहीं हुआ
बेचा-ख़रीदा भी नहीं गया ,
ये तो प्रदूषण का कमाल है।
भरी दोपहरी में,
जब सूर्य अपनी जवानी पे होता है,
दिल्ली के सूरज को प्रदूषण निगल रहा है ।
बात नहीं ये खुश होने की,
कि हम बचे हुए हैं,
अब हमारी हम सब की बारी है।
जो बोया उसे काटना ही होगा
हरियाली से मुँह मोड़ के,
ईंट पत्थरों से प्यार जता के ,
जलती सुलग़ती जिंदगी चुनने की।
सज़ा तो देगी प्रकृति।
जो लोग सोच सकते थे ,
बचा सकते थे ,बर्बाद होती नस्लों को
उन्हें फुरसत कहाँ ?
व्यस्त और बड़े लोग,
बहुत कुछ करना है उन्हें ,
मंदिर -मस्जिद, पंडित -मुल्ला
गाय -सूअर, देशभक्त-देश द्रोही
ऐसे ही बड़े -बड़े काम
जनता जाये भांड में।
पटेल की मूर्ति ,पटेल के देश में
विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा।
क्या यही चाहते थे पटेल ?
कि जिन्दा लोगों को
शतरंज के मोहरों में बदल दिया जाय।
और मरे हुए लोगों की
मूर्तियों में उनके आदर्शों को दफ़ना दिया जाय,
ताकि मुर्दा बस्ती में, उनका नाम जिन्दा रहे।
शायद …

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