गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

दिन आ रहे हैं

बदी को मिटाने के दिन आ रहे हैं।
नया दौर लाने के दिन आ रहे हैं।

अरे ओ फरेबी न तुझ पर भरोसा
कि तुझको मिटाने के दिन आ रहे हैं।

तुझ को मिटा कर ही अब सांस लेंगे
तिरंगा फहराने के दिन आ रहे हैं।

सुनी हैं कभी तूने सिंह की दहाड़ें
तुझे जड़ से हटाने के दिन आ रहे हैं।

वतन से बड़ा है न कोई जहां में
उस पर मिट जाने के दिन आ रहे हैं।

शमा ए वतन पर फिदा हम परवाने
तुझ पर जां लुटाने के दिन आ रहे हैं।

अजी आ गयी अब तो जल्दी दिवाली
दिये अब जलाने के दिन आ रहे हैं।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
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भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों…
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