गुजरा हुआ जमाना

दिनों के बाद गुजरा सामने से आशियाने के l
मिले फिर से कई किस्से मुझे बीते जमाने के ll

मिली सूनी पड़ी कोई हवेली राह तकती सी l
मिले सूखे हुए आंसू समय बीते बहाने के ll

मिला ऋतुराज भी अपनी उमंगों को समेटे साl
कहीं हो ढूंढता जैसे बहाने गुल खिलाने के ll

खड़ा ऊंचा हिमालय सा रहा मैं शीश को ताने l
नदी कल कल धरा पर चाल चलती है लुभाने के ll

चलो छोड़ भी यह गलियां रहा ना कंत का आना l
“सलिल” सब बंद अब ताले जो खुशियों के खजाने के ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेशl

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