.
Skip to content

दिनचर्या से विराम

Vinod Chadha

Vinod Chadha

कविता

October 12, 2017

…..दिनचर्या से विराम…..

जिंदगी की रोज की भाग दौड़
वो ही सूरज की पहली किरण से दिन का आगमन
दिन भर धुप छाँव के बीच रोजी रोटी की कश्मकश
और फिर अपनी लालिमा को समेटते
थके हारे ढलते सूरज से दिन के अंत का आगाज

रोज की दिनचर्या से
लेते हुए एक अल्पविराम
देखा, कलमों के बीच से झांकती सफेदी
न जाने कब, हौले हौले, फैल कर
दिखाने लगी अपना रंग
लगी एहसास दिलाने मेरी ढलती उम्र का

दिख रहे हैं
पेड़ पर शने शने, पीले होते पत्ते
जो बढ़ रहे हैं अपनी परिपक्वता की ओर
देने को स्थान नई कोपलों को
इंतजार है बस अब एक पतझड़ का

नई पीढ़ी भी
आगे आने को तैयार है
समय आ गया है करने को प्रस्थान
झांकने को अपने अतीत में
और करने को
अपने अच्छे बुरे का हिसाब किताब
धर्म कर्म और नेकी बदी का हिसाब किताब
और उसके साथ करने को उस परम पिता को प्रणाम ।

…विनोद चड्ढा…

Author
Vinod Chadha
Recommended Posts
इक नया भारत
अब एक् न्य भारत बनाना है लेकिन जरा हौले हौले, उनको भी सबक सिखाना है लेकिन जरा हौले हौले। लूट लिया मेरे हिन्द को देश... Read more
पहला एहसास.
छोटी छोटी आँखे उजाले का आभास सी कराने लगी थी, दिन और रात चाँद और तारों की छटा आकाश में छाने लगी थी। रिमझिम करती... Read more
रिश्तों के बदलते रंग
रिश्तों के बदलते रंग ******************* आज शादी के दो सालों में सूरज और चंदा के बीच एक छोटी सी बात को लेकर जमकर झगड़ा हुआ... Read more
विस्मित करता प्रभात....
प्रभात का प्रकाश विस्मित करता हर रोज नयी ऊर्जा का संचार खुल रहे हैं फिर उस देहरी के द्वार! जाना है हर रोज नियमित नयी... Read more