कविता · Reading time: 1 minute

दाड़ी के सफेद बाल

तू देखकर खतरा,
अक्सर नजर फेर लेता है
बाद में भाइयो-बहिनों कहकर
सबका मन मोह लेता है ।

सब परेशान है,
विवाह के बंधन से
विवाह तोड़कर अपना
तू लोगों से नया रिस्ता जोड़ लेता है ।

पेट्रोल-गैस-तेल के दाम,
ऐसे ही नही बढ़ाए है
अपना रिस्ता मजबूत रखने
तू घरों में कलह मचाए रखता है ।

साला होने की औकात,
बदस्तूर समझता है
बहिनो को पटाकर
जीजाओं का खर्च बढ़ाता रहता है ।

तेरी दाड़ी का खर्च भी,
हम ही उठाते हैं,
तभी उसमे काला बाल
कोई नजर नही आता है ।

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