दारू के दोहे

मछली पानी के तड़पत है,
दारू तड़पे लोग |
सड़क हादसे मे क्यो मर रहे,
सोचो इतने लोग ||

दारू पीबन को पैसा है,
पैसा नही पढावन खो |
आई नचनिया अगर गाँव मे,
पैसा लगे उडा़वन खो ||

दारू पीके लगे ढुड़कने,
डंडे घल रहे बीस |
आये पिताजी सुनकर जोड़े,
ले गये उन्हें घटीस ||

शरम मे उनकी गर्दन झुक गई,
खो दई सव पहचान |
सारे कुल की नाक काट दई,
कर दओ सब कल्याण ||
कृष्णकांत गुर्जर

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